अभिकथन
गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013
शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013
रविवार, 13 अक्टूबर 2013
रतीनाथ योगेश्वर की कवितायेँ
मछली की तरह
बिकने से पहले
बर्फ की सिल्लियों के बीच
तुम्हे रखा जायेगा
तराजू पर तुलने से पहले
तुम्हारे गलफड़ों को
निर्ममता के साथ उभारकर
देखा जायेगा -
कि तुम अभी सड़े नहीं हो
हो इस्तेमाल के लायक
असहाय तुम
कई टुकड़ों में बंट जाओगे
और पिछवाड़े कूड़े के ढेर से
जब तुम्हारी पसलियाँ
चीटियाँ ले जा रही होंगी
तब भी अँधेरे में
चमकती रहेंगी
व्यवस्था की दो आँखें
बिल्ली की तरह--------------
बिकने से पहलेबर्फ की सिल्लियों के बीच
तुम्हे रखा जायेगा
तराजू पर तुलने से पहले
तुम्हारे गलफड़ों को
निर्ममता के साथ उभारकर
देखा जायेगा -
कि तुम अभी सड़े नहीं हो
हो इस्तेमाल के लायक
असहाय तुम
कई टुकड़ों में बंट जाओगे
और पिछवाड़े कूड़े के ढेर से
जब तुम्हारी पसलियाँ
चीटियाँ ले जा रही होंगी
तब भी अँधेरे में
चमकती रहेंगी
व्यवस्था की दो आँखें
बिल्ली की तरह--------------
शनिवार, 12 अक्टूबर 2013
रतीनाथ योगेश्वर की कवितायेँ
औरतें
पैथन लगे
आटे की लोई की तरह
चकले पर
गोल गोल घूमती हैं
काले कड़ाहे के
खौलते तेल में
उतार दी जाती हैं
---बेआवाज़
गर्म मुलायम
पुड़ियों की तरह
किसी महाभोज का
निवाला बन रही हैं
---औरतें
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013
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